सफर हमारा, सफर उनका

 और इस तरह, एक लम्बा सफर ख़तम होने को आया,

उन्हें उतरना है अगले स्टेशन पे, मेरा सफर है अभी बाकि|

पहली बार लगा, काश रास्ते इतनी छोटी न होती, 

काश, वख्त से थोड़ा सा और, वख्त चुरा पाता !


हाँ, शुरुआत में दिक्कते हुई बहुत, शोर जो था इतना |

उनकी बातें मुझतक पहुचने से पहले ही,

पटरियों की धड़क धड़क शोर में कहीं ग़ुम सा जाता | 

मग़र अब, अब तो वो शोर भी कानो में सह सा गया था |

पहली बार लगा, काश वख्त इतनी कम न होती, 

काश, वख्त से थोड़ा सा और, वख्त चुरा पाता !


बहरहाल, अब पहुचने ही वाले थे हम |नहीं,

हम नहीं, सिर्फ वो पहुचने वाले थे, 

रास्ता हुआ था ख़तम उनका | मेरे हिस्से का,

सफर तो था बाकि अभी, और, लम्बा |

रेल की रफ़्तार अब आहिस्ते होने लगी | पटरियों की,

धाडकड़ाहट भी अब होने लगा था कम | वही दूसरे तरफ,

मेरी धड़कने, सांसे तेज़ी पकड़ रही थी | मग़र वो शोर,

मुशफिरो की भीड़ में कहीं दब सा गया था |


रेल रुकी, सब लोग उतरने भी लगे | और वो उतरे,

आखिर में सबसे | शायद उन्हें भी, मेरी तरह ही,

थोड़ी और वख्त की तलाश थी | 

उनके साथ, मैं भी उतरा | सामान भी उतारा |

उनके आखो में नजरे पड़ी, तो देखा ! मंज़िल की 

ये बदसुलिखि, राश उन्हें भी न आया |

एकबार तो लगा, रोक लू उन्हें अपने साथ | 

या, रुक जाऊ मैं ही साथ उनके | सीने में

जो तूफ़ान,लब्ज़ बनके निकलना है चाहता |

कर दू उसे बयाँ ? मग़र, यही तो मसला है,

मग़र यही तो मसला है, के रुक गया, 

तो लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे? 


रेल ने, लम्बी सिटी बजा के होश दिलाया | वरना,

मैं तो कमबख्त दिल के चक्कर में भूल ही गया था,

मुझे तो अभी दूर है जाना | 

रेल खुलने ही वाली थी | मैं चढ़ के,

दरवाजे पे खड़ा हुआ, सिर निकला बाहर |

गाड़ी चलने लगी, वो पोछे सरकने लगे |

मैं और थोड़ा बाहर झुका | देखा, वो हाथ हवा में

लहरा के अलविदा कह रहे है | मैंने भी किया वही |

अब तो गाड़ी रफ़्तार पकड़ रही थी | वो और तेज़ी 

से पीछे जाने लगे | कोशिश की थी उन्होंने भी, 

थोड़ी दूर तक साथ चलने की | मैं आखरी हद तक 

बाहर झुक गया था | इस डर से, के कही

वो नज़रो से ओझल होने से पहले, नज़रो से ,

न खो जाता !


धीरे धीरे वो धुंधले होने लगे | नहीं, वजह सिर्फ दुरी नहीं थी,

आखो में दो बूँद, आंसू जो ठहर गया था | आखरी बार ,

जब उन्हें देखा, तो लगा, वो सामान वही छोड़ के,

चलते हुए प्लेटफार्म के आखरी छोर तक आ गए है |

दिल को बहलाने के लिए कहा, शायद, किसी और मरतबा,

 ये सफर हो पूरा |

अब दरवाजे से हटने की बारी थी | क्या पता,

अगले स्टेशन में किसी और को, जरुरत इसकी पड़े |

शायद, किसी और को भी, कहना हो अलविदा |


वापस अपने जगह पे जा बैठा | लगा, 

की इतनी बाते की हमने, कितने सुनाये किस्से |

मग़र, कुछ बाते, अनकही, अधूरी ही रह गयी |

अब फिर से चला मैं | साथ मे,उनकी यादे, 

एक तनहा सफर, और फिरसे, वही पटरी की 

धड़क धड़क, धड़क धड़क || 

Comments